Friday, 28 February 2020

जीवन है

जीवन है ये जीवन में बदलाव ज़रूरी है
कभी ज़रूरी धूप तो कभी छाँव ज़रूरी है

मंज़िल मिल जायेगी बस है चलने की देरी
स्वागतोत्सुक नवप्रभात निशि ढलने की देरी
दृढ़ निश्चय कब बाधाएँ टिक पाती हैं
अर्जुन के तरकश से तीर निकलने की देरी

जताना नहीं

हम सफर में चले हैं तुम्हें छोड़कर, अपनी आखों में आँसू न लाना कभी
दर्द बेइंतेहा होगा बेशक तुम्हें तुम मगर ये किसी से जताना नहीं

मौत से मन हमारा भरा ही है कब
सच्चा हिन्दोस्तानी डरा ही है कब
हम वतन के सिपाही वतन पर फ़ना
जो वतन पर मरा वो मरा ही है कब

आग आख़िर चिता की तो बुझ जाएगी, आग सीने से अपने बुझाना नहीं

थी कसम हमको इस राह जाना ही है
मादरे हिन्द पे जाँ लुटाना ही है
एक वादा करो तुम भी ऐ साथियों
अम्न के दुश्मनों को मिटाना ही है

भूल जाना भले साँस लेना मगर, तुम ये वादा कभी भी भुलाना नहीं

आने लग गयी

2122 2122 2122 212
सब्र को  मेरे फिज़ा  फिर   आज़माने  लग   गयी
रातरानी की महक खिड़की  से आने  लग   गयी

है  इरादा  क्या  हवा  तू  चाहती  है   क्या    बता
रात  गहराई   है  तू   शम्मा   बुझाने  लग    गयी

जो समझ पाती नहीं थी प्रोज क्या पोएम है क्या
वो भी पगली  प्रेम  में  कविता  बनाने  लग  गयी

पूछना  था   जो  कभी   वो  पूछ  ही  पाया  नहीं
जब मिली जाने मुझे क्या-क्या  बताने  लग  गयी

प्यार में  इक़रार   तो  उसने  किया  ही  था  नहीं
मुझपे जाने कब वो अपना हक़ जताने  लग गयी

साँस चलने से हासिल ही क्या साथ जो ज़िंदगानी न हो
ऐसे दरिया क्या फ़ायदा ग़र जो दरिया में पानी न हो

ज़िंदगी भी नहीं काम की प्यार की जो कहानी न हो
और पानी भी किस काम का जिसमें कोई रवानी न हो

जब निसाँ ही न ग़म के मिटे तो खुशी बोलो कैसी खुशी
दर्द भी यार बेकार है दर्द जो आसमानी न हो

हर एक मोड़ पर

2122 1221 2212 2122 12
ज़िंदगी के हर एक मोड़ पे बस तुम्हारी निशानी मिली
जितने पन्ने पलटते गये सब में एक ही कहानी मिली

उम्र ढल भी गयी तो भी क्या तुम चले भी गये तो भी क्या
गाँव लौटे तो हमको वही अपनी ज़िंदा जवानी मिली

फिर कई साल के बाद हम अबके होली में रंगीन हैं
घर की संदूकची में दबी एक चिट्ठी पुरानी मिली

होंगी मौसम की मज़बूरियां उसने हमको न मिलने दिया
पर मेरे सामने जब पड़ी बर्फ भी पानी पानी मिली

जय बोलो मतदाता की

लोकतंत्र के अग्रपूज्य की भारत भाग्य विधाता की
निर्वाचन का महायज्ञ है, जय बोलो मतदाता की

जय जनता में निहित शक्ति की
जय पुनीत इस राष्ट्रभक्ति की
लोकतंत्र में पुण्य आस्था
संविधान के हेतु भक्ति की

जननायक की जय से पहले जननायक निर्माता की

मूर्तिकार है जो सर्जक है
वही चेतना का मूलक है
केंद्र वही है इस रचना का
वही शक्ति का उत्सर्जक है

शक्ति पूजने से पहले जय बोलो शक्ति प्रदाता की

सर्वप्रथम अभिनंदन किसका
रोली टीका चन्दन किसका
कहलाता गणतंत्र मूल, जो
राष्ट्र हृदय स्पंदन, उसका

लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी संविधान अवधाता की

  

मुक्तक बरसात

कभी श्यामल घटाओं से घिरी फिर रात ना होगी
समंदर झील नदियों ताल की फिर बात ना होगी
अगर पेड़ों को काटोगे बिना सोचे बिना समझे
तो यारों इस धरा पर फिर कभी बरसात ना होगी

झूम कर मेघ कोई छत पे जब बरसता है
मुझको लगता है मेरे हाल पे वो हँसता है
साथ भीगे थे कभी जैसे बारिशों में हम
भीग जाने को फिर से मन मेरा तरसता है

नाम धरती के  अपनी  सारी  ज़वानी  लिख  दी
मिटा के ख़ुद को मोहब्बत की निशानी लिख दी
जो मेरी आँख  की  कोरों  में  आ  के  ठहरी  थी
बादलों  ने  बरस  के  वो  ही  कहानी  लिख  दी