Friday, 28 February 2020

मुक्तक बरसात

कभी श्यामल घटाओं से घिरी फिर रात ना होगी
समंदर झील नदियों ताल की फिर बात ना होगी
अगर पेड़ों को काटोगे बिना सोचे बिना समझे
तो यारों इस धरा पर फिर कभी बरसात ना होगी

झूम कर मेघ कोई छत पे जब बरसता है
मुझको लगता है मेरे हाल पे वो हँसता है
साथ भीगे थे कभी जैसे बारिशों में हम
भीग जाने को फिर से मन मेरा तरसता है

नाम धरती के  अपनी  सारी  ज़वानी  लिख  दी
मिटा के ख़ुद को मोहब्बत की निशानी लिख दी
जो मेरी आँख  की  कोरों  में  आ  के  ठहरी  थी
बादलों  ने  बरस  के  वो  ही  कहानी  लिख  दी


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