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Friday, 28 February 2020

जय बोलो मतदाता की

लोकतंत्र के अग्रपूज्य की भारत भाग्य विधाता की
निर्वाचन का महायज्ञ है, जय बोलो मतदाता की

जय जनता में निहित शक्ति की
जय पुनीत इस राष्ट्रभक्ति की
लोकतंत्र में पुण्य आस्था
संविधान के हेतु भक्ति की

जननायक की जय से पहले जननायक निर्माता की

मूर्तिकार है जो सर्जक है
वही चेतना का मूलक है
केंद्र वही है इस रचना का
वही शक्ति का उत्सर्जक है

शक्ति पूजने से पहले जय बोलो शक्ति प्रदाता की

सर्वप्रथम अभिनंदन किसका
रोली टीका चन्दन किसका
कहलाता गणतंत्र मूल, जो
राष्ट्र हृदय स्पंदन, उसका

लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी संविधान अवधाता की

  

Monday, 11 December 2017

मन तुझको

मन तुझको मैं क्या बहलाऊँ टूटी फूटी आशाओं से

मुझे पता है टूट चुका है जो था अब तक भ्रम का घेरा
किरणें झूठी लुप्त हुई हैं अब यथार्थ का  घोर  अँधेरा

यंत्र तंत्र कब बाँध सकें हैं अजय काल को सीमाओं से

एक नियंता एक धुरी है शेष जगत तो  चाकर  ठहरा
सबका है अस्तित्व उसी से ऊँचा नभ या सागर गहरा

करूँ अहं क्या सुविधाओं का क्या घबराऊँ विपदाओं से

पल भर को भूला था तुझको सोचा था मैं बहुत बड़ा हूँ
जीवन के अंतिम क्षण पाया जहां से चला वहीं खड़ा हूँ

लक्ष्य डूबना  था  मेरा  मैं  क्यों  लड़ता  था धाराओं से

जीवन पथ पर विजय मिली तो श्रेय लिया मोती बाँटे
अश्रु असीमित बहे वहाँ पर  जहाँ  मिले  थोड़े  काँटे

क्यों न रहा मैं परे जीत की और हार की घटनाओं से

लिखे हुये में जुड़े घटे ना चाहे जितनी  कलम  चला ले
लिखने और मिटा सकने का जानें क्यों झूँठा भ्रम पाले

सत्य तुझे मैं क्यों झुठलाऊँ उम्मीदों की कविताओं से
                                          प्रवीण 'प्रसून'
             

Sunday, 29 October 2017

सरदार पटेल

  अदम्य शक्ति देशभक्ति सौम्यता  का  मेल था
  जो राष्ट्र के लिये जिया वो नाम एक पटेल था

सरल स्वभाव था मगर वो व्यक्ति अति विशेष था
वो कार्य पूर्ण कर दिया  जो   कार्य  एक  शेष  था
जो  चित्र  था  अपूर्ण  पूर्ण  मानचित्र   कर  दिया
किया अखण्ड सिंह ने जो खण्ड -खण्ड  देश  था

अथाह शक्ति पुंज  था  वो  भारती  का  लाल  था
समस्त विश्व  के  लिये  अतुल्य  एक  मिसाल  था
बँटे   कटे   मनों   को   एकता   के  सूत्र  में  पिरो
जो काम उसने कर दिया वो काम क्या कमाल था

वो   कर्म   में   कठोर   था  इसीलिए  अजेय  था
सृजन   में   राष्ट्र   के   बहुत  महत्वपूर्ण श्रेय  था
कभी  न   लोभ   में   बँधा  अनन्य  देशभक्त  वो
एकमेव   सेवा   मातु   भारती   की    ध्येय   था

बही  न  बूँद  रक्त  की  विजय  हुई  जिधर  चला
वो विश्व को सिखा गया है क्रांति की  नयी  कला
महापुरुष  महाबली  वो  लौह  -सा  अडिग  रहा
जो कर लिया विचार फिर विचार  से  नहीं  टला
                             :प्रवीण 'प्रसून'

Tuesday, 22 August 2017

मैं हथेली पर

मैं हथेली पर लिये हूँ एक दिया उम्मीद का
किन्तु नैराश्य की आंधी न रोके रुक रही

सूख कर जो मर गए पौधे न ये हरियाएँगे
अब सृजन की कल्पना में गीत कैसे गाएंगे
खंडहर के स्वप्न दुस्तर छोड़ते पीछा नहीं
नींव नव निर्माण की कैसे कहो रख पाएंगे

अब उजाले की बची संभावना भी चुक रही

तन हुआ आज़ाद लेकिन मन नहीं आज़ाद है
जीभ पर अब भी गुलामी का बचा कुछ स्वाद है
क्रांति के किस्से सभी स्मृति पटल से मिट गए
या तुम्हें बलिदान का वो दौर अब भी याद है

मुश्किलों के सामने गर्दन कहो क्यों झुक रही

आपसी सम्बन्ध सारे बेतरह कड़ुआ गये
प्रेम के पौधे जलन की धूप में मुरझा गये
अर्थ ही आधार है अब व्यर्थ सब व्यवहार हैं
वे सगे जो स्वार्थ वाले दायरे में आ गये

मित्रता अब क्यो नियत अधिकार की इच्छुक रही

Monday, 26 June 2017

एक था राजा एक थी रानी

बजने दे पायल की रुनझुन
कहने दे फिर वही कहानी
एक था राजा एक थी रानी

मौन की जब जब टूटी कारा
शब्दों ने तब गीत सँवारा
जब संगीत मिला गीतों से
फूट पड़ी स्मृति की धारा

गीत मेरा संगीत तुम्हारा
साज नया हो बात पुरानी

दिल मे हूक लगे तब उठने
पेड़ों पर जब पपिहा बोले
नीलगगन सी विस्तृत यादें
क्यों यादों के परदे खोले

वो पनघट की मधुरिम सुबहें
वो मधुवन की शाम सुहानी

खेल-खेल में छेड़ दिया तो
रूठी राधा कृष्ण मनाये
बात बात में बात बढ़ी यूँ
हठ कर बैठी पास न आये

यादों में वो मान मनव्वल
भूल न सकती खींचातानी
         

कृष्ण को मुंह मोड़ना है

ज़िन्दगी जीना है, तुमको छोड़ना है
एक तिनके से हिमालय तोड़ना है

बंद दरवाजे निकल सकता नहीं हूँ
मैं तुम्हारे साथ चल सकता नहीं हूं
पर टँके जो चित्र मन दीवार पर हैं
मैं उन्हें भी तो बदल सकता नहीं हूं

बस दीवारों से मुझे सर फोड़ना है

मुश्किलों के सामने झुकना नहीं है
अब किसी के भी लिये रुकना नहीं है
टिमटिमाता मैं दिया हूँ तेल कम है
दिन निकलने  तक मुझे बुझना नहीं है

गर्म मरुथल और मुझको दौड़ना है

हैं प्रतीक्षा में अभी वीरान पनघट
और मधुवन में अभी है शेष आहट
फिर अभी राधा खनक करके हँसेगी
प्रेम सावन में भरेंगें रीते मन-घट

कर्मयोगी कृष्ण को मुँह मोड़ना है

बहते बहते हार गया

दो गीत लिखे थे यौवन में
एक मिलन कथा एक विरह व्यथा
एक गीत अधूरा छूट गया
एक लिखते-लिखते हार गया

वो नीम ठाँव की दोपहरी
वो धूप-छाँव की दोपहरी
जो तपिश विरह की दहकाती
वो प्रेम-गाँव की दोपहरी

तुम प्रिये न फिर मिलने आयी
मैं तकते-तकते हार गया

मैंने इक कोरे पन्ने पर
चेहरे का चित्र उकेरा था
कोरा पन्ना था हृदय मेरा
पन्ने पर चेहरा तेरा था

मैं चला रंग भरने उसमें
पर भरते-भरते हार गया

आसान नहीं था चल पाना
इस जीवनराह तुम्हारे बिन
प्रिय बिना इज़ाज़त यादों को
अपने संग रखता रातोदिन

निर्णय था तुम बिन चलने का
पर चलते-चलते हार गया

हो सकी न पूरी अभिलाषा
अब तक, अब पूरी क्या होगी
मुझसे बढ़कर इस दुनिया में
कोई मज़बूरी क्या होगी

दुनिया के शब्दों के शायक
मैं सहते-सहते हार गया

मैं पंछी मस्त गगन का हूँ
क्या करूँ कटी इन पाँखों का
मैं दिल से सीधे निकला हूँ
दिखता हूँ आँसू आँखों का

कब ?कौन? समय से जीता है
मैं बहते-बहते हार गया
              :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Sunday, 25 June 2017

मेरा मन साथ देता ही नहीं

मेरा मन साथ देता ही नहीं है
समय के साथ चलना चाहता हूँ
न यादों से निकल पाया अभी तक
तुम्हारे साथ मन, मैं अन-मना हूँ

न  भाती   हैं    मुझे    रंगीनियां   भी
न  तो  ये   शोरगुल  बाजार  का  ही
न मुझ पर  है  असर बदले  जहाँ का
असर अब तक है केवल प्यार का ही

अधूरे प्यार की मैं वेदना हूँ

समन्दर हूँ अतुल जलराशि मुझमें
बुझा पाया न लेकिन प्यास तक मैं
ज़मी की धूल सा लिपटा हुआ था
न बन पाया तभी अहसास तक मैं

बहुत रोया मगर मैं अनसुना हूँ

हमेशा साथ रहती हैं भले ही
न कोई पूछता परछाइयों को
कहाँ परवाह खंडित सूत्र की हो
खोजते लोग बिखरी मोतियों को

भग्न उस सूत्र की संवेदना हूँ
                       :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

प्यार कांच सा

प्यार काँच-सा तोड़ हवा क्यूँ अब हमसे  शर्मिंदा है
तूने टूटे काँच सँजोये,खनक मेरे मन ज़िन्दा है

बेध गयी हैं किरचें मन में
तन से क्या अनुमान लगे
आसां है  दिल का लग जाना
पर निभने में जान लगे

मन की पीड़ा मन समझे या जो मन का बाशिन्दा है

किसको फ़र्क पड़ा टूटन से
किसने क्या कितना खोया
दर्द ,उदासी,तड़पन,उलझन
जो ढोया हमने ढोया

एक बहेलिये ने क्या पाया तनहा हुआ परिंदा है

वो पल मिलें असंभव है जब
तो चल चुप ही रहते हैं
खुशी नहीं तो दर्द सही, चल
आधा आधा सहते हैं

खुशियां शायद कम भी पड़तीं ग़म का प्रिये पुलिंदा है

Tuesday, 20 June 2017

ओस की बूँद सा दिल

            ओस की बूँद-सा दिल
           चमकता प्यार झिलमिल
बहुत है सर्द मौसम
हवाएँ कुछ अलग हैं
चाँद की ओर हमको
बढ़ाने और पग हैं

प्यार में साधना को
करेंगे और शामिल

कोई देहरी पे आया
दीप-सा जल उठा मन
उजाला चाहिये तो
ज़रूरी है समर्पण

नेह की रोशनी हो
मिटेगी रात बोझिल

पड़ा नवपल्लवों पर
कुहासा बूँद बनकर
बहुत उम्मीद बाकी
अभी इन्कार मत कर

हाथ मे हाथ हो तो
हार जायेगी मुश्किल
     :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Monday, 20 March 2017

कुछ रंग खो गये हैं

इस उम्र के असर से, कुछ रंग खो गये हैं
कुछ चित्र ज़िन्दगी के, बेरंग हो गये हैं

स्मृति के चित्रपट पर
जो चित्र थे उकेरे
बरसात ये समय की
बैठी हुई है घेरे

कुछ अंश बच गये हैं, कुछ अंश धो गये हैं

कुछ रंग प्यार के थे
कुछ रंग दुश्मनी के
कुछ रंग मेल के तो,
कुछ थे तनातनी के

इकरंग हो गये सब, मन को भिगो गये हैं

इक रंग बचपना था
इक रंग थी जवानी
चेहरे की झुर्रियों में
लिख दी है सब कहानी

पन्ने पलट के पढ़ना, हम क्या सँजो गये हैं
         :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
           फतेहपुर उ.प्र.
         08896865866

Tuesday, 14 February 2017

गीत समर्पित करता हूँ

प्रेम पर्व पावन बेला पर, गीत समर्पित करता हूँ।
जीवन का क्षण क्षण मैं तुमको, मीत समर्पित करता हूँ।
देने को तो शायद तुमको
और न कुछ मैं दे पाऊँ
नौका प्रिये गृहस्थी की भी
मुश्किल से ही खे पाऊँ
ये उपहार तुम्हारे प्रति है, प्रीत समर्पित करता हूँ।
इन संघर्ष भरी राहों पर
कब तुमने वैभव चाहा !
मात्र प्रेम ही माँगा तुमने
प्रेम गीत सुनना चाहा
हृद-वीणा की धड़कन लो,संगीत समर्पित करता हूँ।
संग रही झंझावातों में
हर मुश्किल में साथ दिया
रहा हाथ में हाथ तुम्हारा
मुझे हारने नहीं दिया
जो भी मेरे हिस्से आयी, जीत समर्पित करता हूँ।
      :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Sunday, 18 December 2016

गीत:मेरी चिता के ऊपर

मेरी चिता के ऊपर पहचान तब बनाना,
जगतारिणी नदी में तब अस्थियां बहाना।
लाखों गये डगर से,
पर मुश्किलें वहीं हैं
बच बच निकल गए सब
काँटे अभी वही हैं।
जो कुछ को चुन सकूँ मैं, दो फूल तब चढ़ाना।
कुछ रात में अभी तक
कुछ का हुआ सवेरा
आँगन में रौशनी है
कोने में है अँधेरा
इस तम को हर सकूँ यदि, दीपक तभी जलाना ।
है देख कर दुःखित मन
पौधे ये सूखे सूखे
कितने सड़क किनारे
हैं नवनिहाल भूखे
कुछ की क्षुधा मिटाऊँ तब भोज तुम कराना
जिसके लिए ये जीवन
संघर्ष ही रहा है
आघात अभावों के
जो मुस्कुरा सहा है
उसकी जो जीत लिख दूँ तब हार तुम चढ़ाना।

Wednesday, 7 September 2016

आम आदमी खाट ले गया

साठ साल का ठाट ले गया
राज ले गया पाट ले गया
सोयेगा ना सोने देगा
आम आदमी खाट ले गया

पहले सर से ताज उतारा
फिर ज़मीन से पैर उखाड़े
शायद अब तय हुआ यही है
नहीं चलेंगे अब रजवाड़े

थोड़ी सी जो नाक बची थी
इसी बहाने काट ले गया

सोयेगा ना सोने देगा
आम आदमी खाट ले गया

गुड़ गन्ना का पता नहीं है
बातें हैं कलकत्ता की
सीधे सीधे क्यों ना कहते
राह चाहिए सत्ता की

इज़्ज़त का कर दिया कचूमर
करके बारहबाट ले गया

सोयेगा ना सोने देगा
आम आदमी खाट ले गया

अंदर सोने की थाली है
तरह तरह का मेवा है
छप्पन भोग सजे हैं भीतर
बाहर करे कलेवा है

राजमहल की पोल खुल गयी
रघुवा तोड़ कपाट ले गया

सोयेगा ना सोने देगा
आम आदमी खाट ले गया

क्यों अभाव की सुने कहानी
पात्र स्वयं जो किस्से का
साठ साल में मिला नहीं क्यों
जो था उसके हिस्से का

अब झुनझुना तुम्हारे हिस्से
अपने हक़ की हाट ले गया

सोयेगा ना सोने देगा
आम आदमी खाट ले गया

समझ सको तो इसको समझो
लूट नहीं संकेत हुआ है
साठ साल की राजनीति में
यही देश के साथ हुआ है

घोटालों की जड़ कांधे पे
रख के मुर्दाघाट ले गया

सोयेगा ना सोने देगा
आम आदमी खाट ले गया
          :©प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Saturday, 4 June 2016

पर्यावरण गीत

जिस धरती पर जन्म लिया है, उसका क़र्ज़ चुकायें।
चलो चलें हर एक मेड़ पर, इक इक पेड़ लगायें।

सूना सूना सा लगता क्यों,ये धरती का आँगन
आओ अपने श्रम से लायें,रिमझिम रिमझिम सावन
सूखी बंजर धरती पर हम,चादर हरी बिछायें।

गाँव गाँव हम बाग लगायें,शहर शहर फुलवारी
उपहारों में फूल न दें हम,दें फूलों की क्यारी
अगली पीढ़ी के हित में हम,अब ये रीति चलायें।

बोलो तब भौंरे क्या करते,फूल अगर ना खिलते,
उपवन अगर न होते,कान्हा राधा कैसे मिलते
पावन प्रेम पगे पुष्पों में,ये ही सेज सजायें।

अगर सचेत हुए तो खोया,भी हासिल हो सकता,
आँखें मूँद अगर बैठे तो,कल मुश्किल हो सकता
ठोकर लगने से पहले ही,अच्छा है जग जायें।
   प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Saturday, 7 May 2016

जननी भारत माता

राणा के भाले ने रच दी ऐसी गौरव गाथा।
धन्य हो गई वीर प्रसूता जननी भारत माता।

पिता उदय सिंह महाराज माता जयवंता बाई,
शिशु प्रताप को स्वाभिमान की घुट्टी गयी पिलाई,
सर कट जाये चाहे लेकिन झुके न अपना माथा।

आतताइयों को उनकी ही भाषा में समझाया,
शेरों ने गीदड़ सेना को जमकर धूल चँटाया,
राणा ने हल्दीघाटी में वो इतिहास रचा था।

गढ़चित्तौड़ खड़ा है अब तक देखो सीना ताने,
सुना रहा है नव पीढ़ी को किस्से वही पुराने,
जिस पौरुष ने अपनी माटी का अभिमान रखा था।

चेतक ने भी राजपुताना पौरुष बल दिखलाया,
स्वामिभक्ति में सबसे ऊपर अपना नाम लिखाया,
युद्धकुशलता और बुद्धि में वह मालिक जैसा था।

समय माँगता है अब फिर से राणा वाला पौरुष,
आतंकी का चोला पहने दुश्मन आया फिर घुस,
दिखला दो राणा प्रताप ने कैसा युद्ध लड़ा था।
      -प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
       फतेहपुर उ.प्र.

Monday, 7 March 2016

गृहिणी दीदी आह्वान गीत

            आह्वान गीत

बनकर सबला आँखों में सम्मान लिखो गृहिणी दीदी।
बिंदिया जैसा माथे पर अभिमान लिखो गृहिणी दीदी।

थामो बढ़कर ध्वजा दिखा दो जन-जन को अपनी हस्ती
हर नारी में एक सरस्वति दुर्गा औ लक्ष्मी बसती
कर दे युग परिवर्तन वो अभियान लिखो गृहिणी दीदी।

उन्नति के नीलगगन पहुँचो तुम श्रम के पंख लगा लो
फिर नए नए प्रतिमान गढ़ो जागृति की अलख जगादो
भाग्य लकीरों में अपना संधान लिखो गृहिणी दीदी।

चलकर संघर्षो के पथ पर ही सृजन नया होता है,
माली के हक़ में तब प्रतिदिन इक सुमन नया होता है।
आगे पथिकों हित राहें आसान लिखो गृहिणी दीदी।

अब तक ठोकर सही मगर अब राह बना लो एक नई
एक राह से ही निकलेंगी फिर उन्नति की राह कई
अपनी हिम्मत से नूतन सोपान लिखो गृहिणी दीदी।

अपने पैरों चल दो अब औरों का आलंबन छोड़ो
बहुत उजाला जीवन में अंधेरे का अब भ्रम तोड़ो
बनकर ख़ुद सूरज जैसा दिनमान लिखो गृहिणी दीदी।

श्वेत शक्ति के इस प्रयास को सादर नमन 'प्रसून' करे
प्रगति संगठन इसी भाँति दिन दून रात चौगून करे
स्वाभिमान से जीवन का जयगान लिखो गृहिणी दीदी।

Wednesday, 1 May 2013

आऊँगी ना लौट दुबारा

(हैवानों का शिकार हुई मासूम बहनों की ओर से)


डूब गया इक नन्हा तारा।
हैवानों से जीवन हारा।।
मुश्किल से आँखें खोली थी,
अंतिम बारी फिर रो ली थी,
ज़्यादा कुछ वह कह न पायी,
छुटकी बस इतना बोली थी,
पापा मेरी क्या ग़लती थी,
अंकल ने क्यूँ मुझको मारा?
मेरे जाने पर मत रोना,
होंठो की मुस्कान न खोना,
मुझको बस चिंता इतनी ही,
मेरे भैया मेरे सोना,
दूज और रक्षाबंधन को,
कौन करेगा तिलक तुम्हारा।
मम्मी मेरे बिन रह लेना,
मैं जाती हूँ दुःख सह लेना,
कहना-सुनना जो बाकी हो,
सपनों में अब कह-सुन लेना,
दुनिया मम्मा गन्दी कितनी,
आऊँगी ना लौट  दुबारा।
               रचनाकार-प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
                               फतेहपुर उ.प्र.
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