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Monday, 26 June 2017

ॐ घाट

यह छोटे से शहर
फतेहपुर का
ॐ घाट है
गंगा बेशक़ मैली हैं
यहाँ भी
पीछे से बहकर आये
महानगरीय कचरे से
लेकिन पाट
प्रदूषण मुक्त है
इस युग के
भागीरथ स्वामी विज्ञानानंद के
पवन प्रयास से
यहाँ तक अभी
मेले का कानफोड़ू शोर
चाट के ठेले की टनटनाटन भी
पहुँच नहीं पायी
और न अपसंस्कृति के
प्रदूषण को किसी ने यहाँ का
पता दिया...
घाट की सीढ़ियों
और झाड़ियों के झुरमुट में
अभी दिखायी नहीं देते
अधनंगे जोड़े
सुकून से घाट पर
चार पल सो लेने की
अभिलाषा
पूरी हो सकती है यहाँ
क्योंकि किसी पुलिस वाले
या किसी गार्ड द्वारा
पीछे से डंडा कोंचकर
निद्राभंग कर देने का भय नहीं है
और न किसी पॉकेटमार द्वारा
जेब साफ किये जाने का ही।
अशोक अर्जुन या आम पीपल
के मनोहारी वृक्ष के नीचे
कुछ पल
स्वयं को ढूढ़ लेना
अभी यहाँ संभव है
क्योंकि अभी बर्गर और पावभाजी
कोल्ड्रिंक और पिज़्ज़ा
वाले लड़के
आपके ध्यान को भंग नहीं करेंगे
क्योंकि कैन्टीन
अभी यहाँ का रास्ता खोज नहीं पायी
महादेव को निहार सकते हैं आप
तब तक जब तक आत्मतृप्ति न हो
क्योंकि अभी लुटेरे पण्डे द्वारा
आपका हाथ पकड़ कर
आगे बढ़ा दिए जाने का डर नहीं है
आराम से आप गंगाजल या
दूध अर्पित कर सकते हैं
आराध्य को
और अभी मेरी गारंटी है कि
दूध या गंगाजल
आपके पीछेवाले के धक्के से
आपके आगेवाले आदमी के
सिर पर
नहीं चढ़ेगा
केवल
आने और जाने का किराया
अगर है आपके पास
तो भी आप ॐ घाट
पर आकर गंगास्नान
कर सकते हैं
क्योकिं यहाँ
प्रसाद चढाने की
अनिवार्यता नहीं है
क्या कहा???
खरीदकर गंगा में फूल फेंकने
की अनिवार्यता
नहीं नहीं
आपको विश्वास हो या न हो
प्रतिबंधित है...
       :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
       फतेहपुर उ.प्र.
      8896865866

Friday, 26 August 2016

सोने दो


एक इंसान ..
डेवलप (?) हो रहे देश में
अपनी अर्धांगिनी की लाश
काँधों पर ढो रहा है
विकास का सपना पाले
आम इंसान हैरान है
हाय! यह क्या हो रहा है?
उसके ऊपर टूट पड़ा पहाड़
क्या उसके पास
समय की कमी है
या असीमित सहन शक्ति
आख़िर वो
क्यों नहीं रो रहा है
चलने दो चलचित्र
बदलने दो दृश्य
म्यूट कर के
शांति से देखते रहो
श्श!!!! कुछ मत कहो
खिंचा रहने दो परदा
जीत की थकन उतरी नहीं है
युद्ध हाल फ़िलहाल होना नहीं है
सोने दो....
छोटी सी बात के लिए
मत जगाओ
राजा सो रहा है
   :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
     फतेहपुर उत्तर प्रदेश
      08896865866

Saturday, 18 June 2016

हाथ वाला पंखा

हाथ वाला पंखा
----------------------
प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
*******************
तुम....
हमें वादों में उलझा कर
बेवकूफ़ बना कर
ख़ुश होते हो
और इतराते हो
अपने चहेतों के बीच
सीना फुलाते हो
अपनी
सियासी समझ पर
इस उमस भरी रात में
अपने दुधमुँहे को लेकर
रात दो बजे तक
बैठती हूँ छत पर
लाइट के इंतज़ार में
दिन भर की थकी
ऊँघती हुई
झलती हूँ
हाथ वाला पंखा
इसलिये कि चैन से
सोता रहे मेरा बच्चा
उधर ए सी में
ऐश करते हो तुम
और तुम्हारे बच्चे
मुझे याद है
चुनाव के समय
तुमने की थी
विकास की बातें
बराबरी की बातें
और समझाया था
कि बटन वही दबाना
जिसके सामने बना हो
"हाथ वाला पंखा"

Tuesday, 24 May 2016

तालाब

तालाब:पाँच कवितायेँ
(१)
बहुत ज़रूरी है
मेरे गाँव के तालाब का
ज़िंदा रहना
क्योंकि यह तालाब
मात्र  गड्ढा नहीं
यह हृदय है इस गाँव का
जो सहेजता है
और संचारित करता है
जीवनदायी तरल
अनवरत।

(२)
एक बुज़ुर्ग तालाब
है बहुत उदास
जिसने देखी हैं
कई पीढ़ियाँ
अफ़सोस
अब उतरते नहीं
बच्चे इसकी सीढ़ियाँ
सूखा मन
धीरे धीरे सिकुड़ता तन
किंकर्तव्यविमूढ़ सा
दर्द सह रहा है
इसके हिस्से का पानी
बेतरतीब बह रहा है।

(३)
तुमसे पूछेंगी पीढ़ियाँ
क्यों नहीं बचाये तालाब
हम बूँद बूँद को तरसे
बोलो....
इतने दिनों से
बादल क्यों नहीं बरसे
तुम्हारे कुकर्मों का फल
हम भोग रहे हैं
तुमने पाट दिए तालाब
हम अपनी कब्रें खोद रहे हैं।

(४)
तालाब ढूँढने आये हो
मत ढूँढो
वे मर चुके हैं
अगर हिम्मत है
तो खोद डालो
ये सोने के महल
इन्हीं के नीचे दफ़्न है
तुम्हारे प्रिय तालाब।

(५)
ख़त्म हो चुकी
तालाब की उम्मीदें
टूट चुका सब्र का बाँध
तालाब का अस्तित्व
मिटाने को
लोग चल रहे हैं सारे दाँव
उखड़ रहे हैं
तालाब के पाँव
   -प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Tuesday, 19 April 2016

क से किसान

     'क' से किसान
      ---------------------

मैं 'क' से किसान हूँ
'ख' से खेती करता हूँ
'ग' से गाँव में रहता हूँ
और......
अब आप सोचेंगे 'घ' से क्या..?
तो सुनिये
'घ' से घोषणाएँ सुनता हूँ सरकारी
'क' से किसान
जो कहने को तो
आता है सबसे पहले
लेकिन वास्तविकता....
मैं हूँ 'ङ' जिसके माने होता है
कुछ नहीं....कुछ भी नहीं
नयी तकनीक ने छीन
लिया है मुझ 'क' से
जो था मेरे  पास
डंडा भी और पूँछ भी
लेकिन 'ङ' बनकर
पंक्ति के सबसे अंत में
बैठे हुये
एक चीज़......शून्य
पहले भी था
और अब भी है मेरे पास
   
-प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
      फतेहपुर उ.प्र.
      08896865866

Tuesday, 16 February 2016

नमिता भरद्वाज जी की कला को समर्पित


------------------------------------------------
ब्रश ने तुम्हारी
उंगलियां पकड़
सीख लिया चलना
भावनाओं ने सीख लिया
रंगों में ढलना
उतर आये कैनवस पर
कुदरती अहसास
यूँ ही नहीं हो जाती होगी
हर चित्र में एक कहानी
जीना पड़ता होगा
उसे उकेरने तक
एक पूरी ज़िंदगानी
ठीक वैसा पवित्र है
चित्र बनाना
जैसा सच कहना
खुशबू सा उड़ना
नदी सा बहना
कुदरत हाथो में लकीरो से
लिखती है सब कुछ
और कला कागज़ पर.....
लकीरों से
उतार देती है कुदरत
-प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून

Thursday, 21 January 2016

फेसबुकिया क्रांति

मैं कई दिनों से प्लानिंग कर रहा हूँ
कि बन जाऊँ एक क्रांतिकारी
ला दूँ हलचल विश्वभर में
बनाऊँ एक इवेंट फेसबुक पर
इन्वाइट करूँ कई हजार को
फिर शुरू करूँ बाँटना
अपना दिमाग़ी फितूर फ्री में
महान चिंतन की तरह
लाइक कम हो जाएँ तो
शुरू करूँ गलियाना, कोसना
किसी ऐसे को जिसे विश्व मानता हो महान
लोग फिर देंगे मुझ पर पूरा ध्यान
और अगर काम न चला तो.....
फिर करूँगा वो जिससे
सच में आ जायेगी हलचल
हो जायेगी सफल
....फेसबुकिया क्रांति

-प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Tuesday, 13 August 2013

पोपली आजी

पोपली आजी
मरकर भूत बन गई है
सब मोहल्ले वाले कहते हैं
और ये भी .....
कि वो डराती है
रात-बिरात
काश ...... वो मेरे पास भी
आये .....डराये
मोहल्ले के सारे बच्चों को
दुलराती थी पोपली आजी
अपने घर के बाहर बैठी
और मुझे सब से ज़्यादा
या ........
हर एक बच्चे को यही महसूस होता
जब से वो मरी है
हमारा टोला गुमसुम है
........और टोली भी
 मैं सोचता हूँ
भूत बनकर भी
कैसे वो डरा पायेगी किसी को
बोलती थी तो
फूक ही निकल जाता था
पोपली आजी के मुँह से
कहानियाँ सुनाती ....हँसाती  आजी
कैसी लगती होगी डराती हुई
मैं सोचता हूँ अगर
वो मुझे डराने आये
तो उसको देखकर ही
हँसते-हँसते मेरा दम निकल जाये

Thursday, 25 July 2013

एक कविता तुम्हारे नाम


तुम्हे पता नहीँ कि,मैँ तुम्हे कितना लाइक करता हूँ
मेरे लैपी के वालपेपर पर रहती हो तुम ही,
स्माइल करती हुयी।
मेरे फ्रेन्ड अक्सर ही शरारत में चुरा लेते हैँ 
पासवर्ड मेरी ईमेल आई डी का
क्यूँकि वो होता है
तुम्हारे ही नाम के अल्फाबेट्स पर हमेशा
कई बार तुम्हेँ ऑनलाइन पाकर मचल उठता हूँ कि
कह दूँ दिल की बात
पर...चैट बाक्स खोलकर रह जाता हूँ बस
लेकिन सच बताना
क्या तुम तब भी समझ नहीँ पाती हो
कि मैँ तुम्हे कितना ल.....सॉरी लाइक करता हूँ
जब मैँ फेसबुक पर तुम्हारे हर पोस्ट को लाइक करता हूँ
और फिर भी मन नहीँ भरता
तो कमेन्ट बाक्स मेँ भी लिख देता हूँ लाइक लाइक लाइक

(कॉपीराइट@रचनाकार प्रवीण कुमार श्रीवास्तव)

Thursday, 7 February 2013

तुम ..


तुम हौले से मुस्काई ...
जैसे कोई ख्वाहिश
रह गई कसमसाकर
पूरी होने को
तुम हँसी
जैसे घने कोहरे के बीच
अचानक हँस पड़ी धूप
तुम ने कुछ लफ्ज़ हवा में तैराए
सफ़ेद चादर पर छितर गए
सात रंग चटकीले
तुम उँगलियों से
चेहरे पर आयी लट हटाती रही
मेरे मन में अनगिन प्रश्न
उलझते-सुलझते रहे
तुम्हारी नज़रें मेरी नज़रों से मिलीं
मेरा तन बदन होता गया गुलाबी
तुमने कदम बढ़ाये
खिलते गए गुलाब
तुम्हारे क़दमों के आगे
और पीछे ....
महकती रही मिट्टी देर तलक
-प्रवीण कुमार श्रीवास्तव


Tuesday, 5 June 2012

बदमाश रात रानी,

उफ्फ! ये रात
फिर उसकी  याद
कोशिश करता हूँ
सो जाने की
लेकिन सो न पाउँगा
ये उसकी यादों को
मुझसे खोने न देगी
बदमाश रात रानी
 महकेगी रात भर
और  मुझे सोने न देगी  

Wednesday, 15 February 2012

एक-एक चूड़ियों पर ।



............................
उसकी खों-खों का
आदी हो चुका है
पूरा टोला,और उसका परिवार झोल खाती चारपाई भी
उस कृशकाय मृतप्राय को
ढोने से कर देती है इन्क़ार कई बार
लेकिन वो जनाना उँगलियाँ बींध देती हैं बार-बार
जो बाँधे हैं उम्मीद
अभी भी पल्लू में
कहना सुनना
अब वश में नहीं
लेकिन मुरझाती आँखें
अभी भी कहती और
ख़ुद ही समझती रहतीं
नज़रें...
बच्चों की पिचकी आँतों.. नासमझ आँखों से होती हुई आख़िर में थककर
ठहर जाती हैं
असमय झुर्रीदार हुईं
जनाना कलाइयों में बच रहीं सिर्फ़ एक-एक चूड़ियों पर ।

मॉडर्न?

अपनी सफलता पर
गला फाड़कर चीख रहे हैं
कुछ अंग्रेजी शब्दों का
चोला ओढ़कर
मॉडर्न? युवा
खुद को स्थापित करने का
हुनर सीख रहे हैं
प्रोफेशनल होने का अर्थ
मतलब के लिए रिश्ते गढ़ना
और
मतलब के लिए तोड़ना
फिक्र सिर्फ अपनी
या फिर
फ्रेंड सर्किल.....
इससे अधिक कतई नहीं
आध्यात्मिक,राजनीतिक
सामाजिक चिंतन
सुनकर
बिदका लेते हैं मुंह
यह कहकर
सो बोरिंग मैटर
और फिर से मशगूल हो जाते हैं
सन्डे रेस्तरां पार्टी का
प्रोग्राम फिक्स करने में
कुछ हिंदी कुछ अंग्रेजी मिक्स करने में  

Monday, 23 January 2012

मुँह चिढाता चाँद

घड़ी की टिक्क
मुझे याद दिलाती है 
जिम्मेदारियों का बोझ धोने की 
और/ हर कदम पर ठोकर
याद दिला जाती है 
हथेलियों में भाग्य रेखा नहीं होने की/बेशक
दृढ़ निश्चय और कर्म से/भाग्य
एक न एक दिन निखर जायेगा
लेकिन मेरा परिवार-मेरा सपना 
निश्चित ही
तब तक बिखर जायेगा
उस दिन व्यर्थ हो जाएँगी
सारी डिग्रियाँ
और निराश हो जाएँगी
मेरी और तकती निगाहें
टुकड़े-टुकड़े जोड़ा गया
उम्मीदों का महल  ढल जायेगा
बस बेरोज़गारी का प्रमाणपत्र 
हाथ रह जायेगा
मन क्रांत है/बेहद अशांत है
उगता सूरज तो अब भी हर रोज़
आशा की एक किरण ले आता है
लेकिन रात
फिर वही ढाक के तीन पात
ये मुँह  चिढाता चाँद
खिल्ली उड़ाते तारे अच्छे नहीं लगते

Thursday, 12 January 2012

चलन के सिक्के और नोट

चलन का एक छोटा सिक्का
दो फैली हुई आँखें
और उसी के इर्द सिमटी हुई
आशाएं और उम्मीदें
खर्च...
रोटी से शुरू और रोटी पर ख़त्म
और फिर शुरू होता है
सपना उसी सिक्के का
****
चलन के कुछ मंझोले नोट
दो सिकुड़ी हुई आँखें
बिजली पानी का बिल
बिट्टू की फीस
रोज़मर्रा का खर्च
और...
बीवी का दिल
इन हकीकतों के बीच
सपनों की जगह कहाँ?
****
चलन के अनगिनत सबसे बड़े नोट
दो बंद आँखें
क्लब-डांसर ,बीयर-बार
रेसकोर्स-कैसीनो
धुंआ-धक्कड़,शेयर-सट्टा
सपनों से परे हकीकत