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Tuesday, 5 December 2017

आँसू

रात  तन्हा   है  मेरी  और   सहारे  आँसू
ख़त्म  उम्मीद  नहीं  और  न  हारे  आँसू

दर्द की शब में सबब पूछ उजाले का क्या
चंद  उम्मीद   लिये   चाँद  सितारे  आँसू

सूख कर गाल में एक नक्श बना डाला है
हू-ब -हू  दिल  की  दास्तान  उभारे  आँसू

संग  शहनाइयों  के   चूर   ख़्वाब  हो  बैठे
टूट कर गिर गये  आंखों  से  कुँआरे  आँसू

सूख कर रह  गयीं  आँखें  इधर  जुदाई  में
शख़्स यक ले गया है साथ  में  सारे  आँसू
                       
                             प्रवीण 'प्रसून'

Sunday, 9 July 2017

रूठा हुआ होगा

ये' माना साथ तेरे इक दफ़ा धोखा हुआ होगा
हज़ारों चोट से गुज़रा जो' उसका क्या हुआ होगा

बहे हो अश्क़ लाखों पर लिपटकर टूट जाने को,
यकीनन एक कतरा अब तलक ठहरा हुआ होगा।
 
ख़रीदो बेच दो सब कुछ यहाँ मुमकिन ये' मेला है
मुहब्बत का इसी बाज़ार में सौदा हुआ होगा।

मनाने का नहीं अब हक़ तभी वो मुस्कुराता है,
तुझे क्या है पता वो किस क़दर रूठा हुआ होगा।

शिकायत क्या करूँ तुझसे ग़लत मैं भी कहीं पर हूँ,
ख़ुदा का है करम जो भी हुआ अच्छा हुआ होगा।
 
     :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
       फतेहपुर उ.प्र.
       08896865866

Wednesday, 7 June 2017

दर्द सहना अभी आया नहीं है


दर्द सहना अभी आया नहीं है
शेर कहना अभी आया नहीं है
बात ख़ुद से न अब तक हो सकी है
मौन रहना अभी आया नहीं है
गंदगी ढक रही है इस नदी को
तेज बहना अभी आया नहीं है
ताब के वास्ते तपना ज़रूरी
और दहना अभी आया नहीं है
रेत का घर नहीं फ़ौलाद हूँ मैं
ज़ल्द ढहना अभी आया नहीं है
     :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Wednesday, 3 May 2017

रहने की आदत हो गयी है


मुझे अंगार में रहने की आदत हो गयी है
किसी के प्यार में रहने की आदत हो गयी है

फ़लक पर हूँ जमीं पर मैं उतर सकता नहीं हूँ
मुझे अख़बार में रहने की आदत हो गयी है

ज़रूरत पर बिका था मैं हक़ीक़त है मगर अब
उसी बाज़ार में रहने की आदत हो गयी है

हुआ है ख़ास जबसे वो ज़माने से कटा यूँ
उसे दो चार में रहने की आदत हो गयी है

उसे सम्बन्ध-नाते प्यार कारोबार ही लगते
जिसे व्यापार में रहने की आदत हो गयी है
            :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
               फतेहपुर उ.प्र

Wednesday, 8 March 2017

मंज़ूर करती है

1222 1222 1222 1222
सियासत की गली बेनूर को पुरनूर करती है
यहाँ तो बदज़ुबानी भी बहुत मशहूर करती है
उखाड़ो फेंक दो काँटा किसी के दर्द का वायस
रवायत जो कि औरत जात को रंजूर करती है
पता है मछलियों को एक दिन काँटा फँसा लेगा
मगर ये भूख फँसने के लिए मज़बूर करती है
कहीं ये क़ामयाबी दूर अपनों से न ले जाये
यही यक बात मेरे हौसले को चूर करती है
तुम्ही मुंसिफ़ अगर तन्हाइयां लिख दीं मिरे हक़ में
तुम्हारा फ़ैसला ये ज़िन्दगी मंज़ूर करती है
       :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Thursday, 2 March 2017

ग़म क्या करना


ख़ार हो फूल हो हालात पे ग़म क्या करना
मैं तो कहता हूँ किसी बात पे ग़म क्या करना
ख़ाक को आग बना दे वो अगर चाहे तो
ख़ाक हो आग हो औकात पे ग़म क्या करना
कीमती है ये बहुत और मुलाकातों से
आख़िरी बार मुलाकात पे ग़म क्या करना
ढूढता था न मिला आज ख़ुद मिलेगा वो
मौत की रात हसीं रात, पे ग़म क्या करना
जीत पर नाम लिखा ग़र है किसी अपने का
जीत से लाख गुना, मात पे ग़म क्या करना
                          :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
                             फतेहपुर उ.प्र.
                              8896865866
                        

Sunday, 8 January 2017

मैं फ़साने प्यार के बुनता हुआ

कोशिश A के अन्तर्गत
मैं फ़साने प्यार के बुनता हुआ
दरमियाँ दीवार के चुनता हुआ
मान लेता हार ग़र दिखता नहीं
आसमाँ मुझको ज़मीं छूता हुआ
नाम मेरा दूर तक पहुँचा मगर
मैं तुम्हारे नाम पर अटका हुआ
तितलियाँ क्यूँ छोड़ गुलशन को चलीं
अब हवाओं में ज़हर ज़्यादा हुआ
फिर पलट सकता है बाज़ी याद रख
एक प्यादा अंत तक पहुँचा हुआ
         :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Sunday, 1 January 2017

बदलते रहे

वो क्यों बोलने में सँभलते रहे
लगा मुझको सच वो निगलते रहे
वहाँ ख़ास की पूछ होती रही
मियां आम थे हम तो टलते रहे
मिरी ज़िन्दगी की कहानी छपी
रिसाले हज़ारों निकलते रहे
छपा था जो अन्दर वही रह गया
कवर पेज लेकिन बदलते रहे
पता था मुझे झूठ बोला गया
ये मज़बूरियां थी बहलते रहे
    :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Thursday, 29 December 2016

क्यूँ नहीं लेते

221 2121 1221 122
रिश्तों में रंग फिर से चढ़ा क्यूँ नहीं लेते
गिरते हुए मकाँ को बचा क्यूँ नहीं लेते
वो हँस रहे हैं देख तुम्हें अश्क़ बहाते
ये दर्द दुश्मनों से छुपा क्यूँ नहीं लेते
बाहर जो बात जायेगी तो और बढ़ेगी
आँगन में ही ये बात बना क्यूँ नहीं लेते
मौका है दूरियाँ मिटा के प्यार जगाओ
रूठे जो उनसे हाथ मिला क्यूँ नहीं लेते
भूखा पड़ा जो उसको खिला करके निवाला
है बेशकीमती जो दुआ क्यूँ नहीं लेते
      :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
       फतेहपुर उ.प्र.

Tuesday, 27 December 2016

जो दिया था दिल उन्हें गाता हुआ

2122 2122 212
जो दिया था दिल उन्हें गाता हुआ
मिल गया वापस मुझे टूटा हुआ
चोरियां उस रात कुछ ज़्यादा हुईं
देर तक जिस रात को पहरा हुआ
इश्क की उलझन न सुलझी यक दफा
हर दफा मैं ही मिला उलझा हुआ
अश्क़ ने अपना तआरुफ़ यूँ दिया
मैं समन्दर,  बूँद में सिमटा हुआ
अब किसी सूरत न होगा वो जुदा
है यूँ मेरी रूह से लिपटा हुआ
   :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
         फतेहपुर उत्तर प्रदेश

Monday, 26 December 2016

बरकत करते हैं

2222 2222 2222 2
लेकर नेक खयाल अगर हम मेहनत करते हैं
बेशक़ अपनी शोहरत में हम बरकत करते हैं
मंचों पर संजीदा हो कुछ शिरकत करते हैं
कुछ ऐसे भी हैं जो ओछी हरकत करते हैं।
लोग उन्हें कितना नादान समझने लगते हैं
जो हाथों को जोड़ किसी की इज़्ज़त करते हैं।
नाम बुलंदी पर लिख पाना तब ही तो मुमकिन
जब पर्वत पर चढ़ने की हम हिम्मत करते हैं।
अपनी खुशियां दे औरों का ग़म जो ले लेते
लोग फ़रिश्ते बन धरती को ज़न्नत करते हैं।

Saturday, 17 December 2016

सँभाला होगा


किस तरह तुमने भला दिल को सँभाला होगा।
जब मुझे अपने खयालों से निकाला होगा।
दूर वो मुझसे रहे खुश हो ये मुमकिन ही नहीं,
दर्द को मान लो मुस्कान में ढाला होगा।
हुक़्म है एक सितारे को फ़ना होने का,
अब तो सूरज का तेरे घर में उजाला होगा।
मैं इसी ख़्याल में डूबा हूँ हुआ क्या है जो,
बीच बाज़ार मुहब्बत को उछाला होगा
रौंद इस दिल को अगर तुमने बढ़ाये हैं कदम
रास्ता फिर वो यकीनन कोई आला होगा।
  प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
    फतेहपुर उ.प्र.

Wednesday, 26 October 2016

सामना

2122 2122 2122 212
साथ चल पाये नहीं तो हम किनारे हो गये।
और वो लेकर रवानी बीच धारे हो गये।
अब अकेले राह चलने का भरोसा आ गया,
ख़ैर ये अच्छा रहा वो बेसहारे हो गये।
टूटकर बिखरे नहीं जमकर अँधेरों से लड़े,
लोग वो ख़ुद की चमक से ही सितारे हो गये।
इश्क़ की दौलत यही है लो इसे अब बाँट लो,
कुछ तुम्हारे हो गये, कुछ ग़म हमारे हो गये।
इस ज़माने की हक़ीक़त से हुआ जब सामना,
ख़्वाब आँखों की हदों में कैद सारे हो गये।
   :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून

Sunday, 18 September 2016

धोखा हुआ

ठग गया विश्वास फिर से क्या कहूँ मैं क्या हुआ।
फिर मुझे लगता है मेरे साथ इक धोखा हुआ।

बेच मत देना शहीदी खून को इस बार फिर,
चुप न बैठेंगे अगर इस बार ये सौदा हुआ।

एक बेटे के लिए इससे बुरा दिन और क्या!
उसकी माँ पर ग़र उसी के सामने हमला हुआ
 
शेर है तो शेर जैसा वार भी तो चाहिए।
किस सियासी चाह में सीना बता छोटा हुआ।

बीन सुननी है नहीं मुझको सपेरे जान ले,
विष भरा फन चाहिए इस बार तो कुचला हुआ।

ला सके सत्रह के बदले ग़र न सत्रह लाख सर,
बेरहम दुश्मन से फिर बदला भी क्या बदला हुआ।

कह रही दुनिया जिसे ये देश है सबसे जवां,
अब कहीं कहने न लग जाये कि ये मुर्दा हुआ।
        :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
          फतेहपुर उत्तर प्रदेश
           08896865866

Sunday, 11 September 2016

सूरज क़िस्मत का अब बुझने वाला लगता है

सूरज क़िस्मत का अब बुझने वाला लगता है।
उससे लम्बा मुझको उसका साया लगता है।
राहु रिजर्वेशन का उसको ढक कर बैठ गया
पूरा चंदा भी दुनिया को आधा लगता है
वोटों की खेती में पैसा पैदा होता है,
फसलों की खेती घाटे का धंधा लगता है।
हंस समझकर तुमने जिसको कुर्सी दे डाली,
वेश बदलकर बैठा मुझको कौआ लगता है।
अब किस राह 'प्रसून' बताओ हो पैसे वाला
पैसा पाने को भी कितना पैसा लगता है!
                      : प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
                         फतेहपुर उ.प्र.
                           08896865866

Thursday, 8 September 2016

दीवाने कि याद

ये हवा क्यों साथ लायी एक दीवाने कि याद
दो उँगलियों से उलझती ज़ुल्फ़ सुलझाने की याद

आँख के नीचे ये कालापन नहीं कुछ और है,
रेत के दिल में दबी सैलाब के आने कि याद

एक बादल दे गया जो अश्क़ वाली बारिशें दर्द बन अब तक हरी है एक बेगाने कि याद

ऐ ख़ुदा बदकिस्मती का दौर दे कर है कहाँ
कब करेगा खुशनुमा हालात दोहराने कि याद

बाग़ में कलियाँ खिलीं हैं और खिल कर गुल हुईं
आ गयी माशूक़ की खुलकर के हँस जाने कि याद
          :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
            फतेहपुर उ.प्र.
            08896865866

Sunday, 28 August 2016

दिखा कुछ कुछ

रात के बाद ये लगा कुछ कुछ
अब उजाले से राब्ता कुछ कुछ

चल पड़ा आज जब अकेला मैं,
खुल रहा एक रास्ता कुछ कुछ

मौत का खौफ़ हो गया जिस शब,
बस उसी रात मैं जिया कुछ कुछ

अब दवा का असर दिखा मुझ पर
काम करने लगी दुआ कुछ कुछ

दरमियाँ दूरियाँ हुईं जब से,
ख़्वाब इक टूटता लगा कुछ कुछ
         ©प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Saturday, 13 August 2016

अब कुछ तो

1222 1222 1222 1222
बहुत दिन बाद  ये भरने लगा है घाव अब कुछ तो।
हमारे देश में दिखने लगा बदलाव अब कुछ तो।
दिलों के दरमियाँ पैदा हुई थी दूरियाँ कितनी,
जो मन की बात कह दी कम हुआ अलगाव अब कुछ तो।
बरसने से लगे डरने जो कड़वे बोल ये बादल
नदी में नफरतों की आ गया ठहराव अब कुछ तो।
ज़मीं के स्वर्ग से हूरों के आशिक जा रहे ज़न्नत,
मेरे कश्मीर में कम हो रहा भड़काव अब कुछ तो।
अमीरों के लिए केवल नहीं सरकार चलती है,
गरीबों के लिए होने लगे प्रस्ताव अब कुछ तो।
   :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Friday, 15 July 2016

खारे लिए

आ गए तुम ज़मी पर हमारे लिए।
आसमां रह गया चाँद तारे लिए।

तैर मझधार में मंज़िलें ढूंढ ले ,
मिल सकेगा नहीं कुछ किनारे लिए।

हम उसे भूल जाते ये तय था मगर,
मिल गया इश्क़िया फिर इशारे लिया।

तुम गए तो न दिल से ये पतझड़ गया,
राह कितनी मिलीं तो बहारे लिए।

मोतियाँ ले गया है कोई लूट के,
सीप फिर रह गई अश्क़ खारे लिए।
         प्रवीण 'प्रसून'

Sunday, 26 June 2016

चीनी सामान नहीं हूँ

मोदी हूँ नादान नहीं हूँ।
दुश्मन से अंजान नहीं हूँ।

टूट नहीं सकता हूँ ज़ल्दी
मैं चीनी सामान नहीं हूँ।

छोटे प्यादे मात मुझे दें,
इतना मैं आसान नहीं हूँ।

तेरी नीयत जानी-मानी,
हरक़त से हैरान नहीं हूँ।

सबक नहीं ग़र सिखलाया तो,
शेर-ए-हिंदुस्तान नहीं हूँ।
    -प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
    फतेहपुर उ.प्र.
     08896865866