Tuesday, 29 December 2015

फेसबुक चलाने दो

बेटियों को मुझे पढ़ाने दो।
और दीपक मुझे जलाने दो।

बाग में कम न हो कहीं खुश्बू,
फूल कुछ और भी खिलाने दो।

दिल हमारा जवाब दे बैठा,
दर्द को और अब ठिकाने दो।

दोस्त अब घर मिरे न आएँगे,
फोन दो फेसबुक चलाने दो।

राह तकते ख़तम हुईं साँसे,
और कुछ देर आज़माने दो।

-प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
फतेहपुर उ.प्र.
08896865866

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