Wednesday, 7 June 2017

दर्द सहना अभी आया नहीं है


दर्द सहना अभी आया नहीं है
शेर कहना अभी आया नहीं है
बात ख़ुद से न अब तक हो सकी है
मौन रहना अभी आया नहीं है
गंदगी ढक रही है इस नदी को
तेज बहना अभी आया नहीं है
ताब के वास्ते तपना ज़रूरी
और दहना अभी आया नहीं है
रेत का घर नहीं फ़ौलाद हूँ मैं
ज़ल्द ढहना अभी आया नहीं है
     :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Monday, 5 June 2017

सोच कर के शज़र घुना जाये

2122 1212 22
आज तिनकों को फिर चुना जाये
और  फिर   घोसला   बुना  जाये

छोड़  कर  क्यों  गया  मुझे पंछी
सोच कर  के  शजर  घुना  जाये

आप  की  आँख  हो  रही है नम
आप  से  क्या  कहा  सुना  जाये

सर्द  कोहरा  है और दिल
इश्क़ में हो ये   कुनकुना जाये

महफ़िलें  दिल सजा  के  बैठा है
काश   पाज़ेब   रुनझुना    जाये

Monday, 15 May 2017


हुनरमंद है साथ मेहनतकसी
न ये शख्सियत हाशिये में रहेगी

Wednesday, 3 May 2017

रहने की आदत हो गयी है


मुझे अंगार में रहने की आदत हो गयी है
किसी के प्यार में रहने की आदत हो गयी है

फ़लक पर हूँ जमीं पर मैं उतर सकता नहीं हूँ
मुझे अख़बार में रहने की आदत हो गयी है

ज़रूरत पर बिका था मैं हक़ीक़त है मगर अब
उसी बाज़ार में रहने की आदत हो गयी है

हुआ है ख़ास जबसे वो ज़माने से कटा यूँ
उसे दो चार में रहने की आदत हो गयी है

उसे सम्बन्ध-नाते प्यार कारोबार ही लगते
जिसे व्यापार में रहने की आदत हो गयी है
            :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
               फतेहपुर उ.प्र

Monday, 20 March 2017

कुछ रंग खो गये हैं

इस उम्र के असर से, कुछ रंग खो गये हैं
कुछ चित्र ज़िन्दगी के, बेरंग हो गये हैं

स्मृति के चित्रपट पर
जो चित्र थे उकेरे
बरसात ये समय की
बैठी हुई है घेरे

कुछ अंश बच गये हैं, कुछ अंश धो गये हैं

कुछ रंग प्यार के थे
कुछ रंग दुश्मनी के
कुछ रंग मेल के तो,
कुछ थे तनातनी के

इकरंग हो गये सब, मन को भिगो गये हैं

इक रंग बचपना था
इक रंग थी जवानी
चेहरे की झुर्रियों में
लिख दी है सब कहानी

पन्ने पलट के पढ़ना, हम क्या सँजो गये हैं
         :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
           फतेहपुर उ.प्र.
         08896865866

Wednesday, 8 March 2017

मंज़ूर करती है

1222 1222 1222 1222
सियासत की गली बेनूर को पुरनूर करती है
यहाँ तो बदज़ुबानी भी बहुत मशहूर करती है
उखाड़ो फेंक दो काँटा किसी के दर्द का वायस
रवायत जो कि औरत जात को रंजूर करती है
पता है मछलियों को एक दिन काँटा फँसा लेगा
मगर ये भूख फँसने के लिए मज़बूर करती है
कहीं ये क़ामयाबी दूर अपनों से न ले जाये
यही यक बात मेरे हौसले को चूर करती है
तुम्ही मुंसिफ़ अगर तन्हाइयां लिख दीं मिरे हक़ में
तुम्हारा फ़ैसला ये ज़िन्दगी मंज़ूर करती है
       :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Saturday, 4 March 2017


समझो रस्ता पकड़ लिया बर्बादी का
ग़र शायर को नशा चढ़ा उस्तादी का