रिश्तों में रंग फिर से चढ़ा क्यूँ नहीं लेते
गिरते हुए मकाँ को बचा क्यूँ नहीं लेते
ये दर्द दुश्मनों से छुपा क्यूँ नहीं लेते
आँगन में ही ये बात बना क्यूँ नहीं लेते
रूठे जो उनसे हाथ मिला क्यूँ नहीं लेते
है बेशकीमती जो दुआ क्यूँ नहीं लेते
:प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
फतेहपुर उ.प्र.