2122 2122 2122 212
हम उसी एक शख्स से उम्मीद पाले रह गए
ताले रह गए
बीमारी का हाल चलो बीमारों से पूछा जाये
मज़बूरी का अर्थ इन्हीं लाचारों से पूछा जाये
होगा क्या उपचार, ग़रीबी जैसी बीमारी का भी
प्रश्न ज़रूरी है, चलकर सरकारों से पूछा जाये
-प्रवीण 'प्रसून'
08896865866
यही है खून से सींचे हुये अभिमान की माटी
जहां हँस कर लुटाते जाँ यही बलिदान की माटी
जो माँ पर आँच ना आने दें ऐसे शेर से बेटे
जना करती है अपने देश हिंदुस्तान की माटी
माँ तेरी कृपा से हम आकाश झुका देंगे
ग़र पड़ी ज़रूरत तो खुद को भी मिटा देंगे
एक माँ तू एक माँ है अपनी भारत माता
यहाँ दीप जला देंगे वहाँ, शीश कटा देंगे
कर दें जो मन मधुर घण्टियाँ पूजिये
शक्तिरूपी कनक रश्मियाँ पूजिये
माँ को खुश करने का है तरीका सरल
भगवती रूप में बेटियां पूजिये
शान को अपनी परिंदों की शान तक रखना
हसरतें आप भी ऊँची उड़ान तक रखना
ठोस आधार का होना मगर ज़रूरी है
ज़मीं पे पाँव ख़्वाब आसमान तक रखना
शांति सद्भाव का रंग धो जायेगा
होगा अन्याय तब न्याय खो जायेगा
शक्ति का यदि अहं से हुआ मेल तो
एक रावण वहीं पैदा हो जायेगा
मन तुझको मैं क्या बहलाऊँ टूटी फूटी आशाओं से
मुझे पता है टूट चुका है जो था अब तक भ्रम का घेरा
किरणें झूठी लुप्त हुई हैं अब यथार्थ का घोर अँधेरा
यंत्र तंत्र कब बाँध सकें हैं अजय काल को सीमाओं से
एक नियंता एक धुरी है शेष जगत तो चाकर ठहरा
सबका है अस्तित्व उसी से ऊँचा नभ या सागर गहरा
करूँ अहं क्या सुविधाओं का क्या घबराऊँ विपदाओं से
पल भर को भूला था तुझको सोचा था मैं बहुत बड़ा हूँ
जीवन के अंतिम क्षण पाया जहां से चला वहीं खड़ा हूँ
लक्ष्य डूबना था मेरा मैं क्यों लड़ता था धाराओं से
जीवन पथ पर विजय मिली तो श्रेय लिया मोती बाँटे
अश्रु असीमित बहे वहाँ पर जहाँ मिले थोड़े काँटे
क्यों न रहा मैं परे जीत की और हार की घटनाओं से
लिखे हुये में जुड़े घटे ना चाहे जितनी कलम चला ले
लिखने और मिटा सकने का जानें क्यों झूँठा भ्रम पाले
सत्य तुझे मैं क्यों झुठलाऊँ उम्मीदों की कविताओं से
प्रवीण 'प्रसून'
रात तन्हा है मेरी और सहारे आँसू
ख़त्म उम्मीद नहीं और न हारे आँसू
दर्द की शब में सबब पूछ उजाले का क्या
चंद उम्मीद लिये चाँद सितारे आँसू
सूख कर गाल में एक नक्श बना डाला है
हू-ब -हू दिल की दास्तान उभारे आँसू
संग शहनाइयों के चूर ख़्वाब हो बैठे
टूट कर गिर गये आंखों से कुँआरे आँसू
सूख कर रह गयीं आँखें इधर जुदाई में
शख़्स यक ले गया है साथ में सारे आँसू
प्रवीण 'प्रसून'
इधर से हाथ जोड़े जा रहे हैं
उधर से सांप छोड़े जा रहे हैं
चुनावी दौर दारू मुफ़्त की है
शहर में काँच तोड़े जा रहे हैं
-प्रवीण 'प्रसून'