Friday, 28 February 2020

2122 2122 2122 212

हम उसी एक शख्स से उम्मीद पाले रह गए
ताले रह गए

Saturday, 31 August 2019

मुक्तक

बीमारी का हाल चलो  बीमारों  से   पूछा  जाये
मज़बूरी का अर्थ इन्हीं  लाचारों  से  पूछा  जाये
होगा क्या उपचार, ग़रीबी जैसी बीमारी  का भी
प्रश्न ज़रूरी है, चलकर सरकारों  से  पूछा जाये
                       
-प्रवीण 'प्रसून'
08896865866

Monday, 8 October 2018

मुक्तक

यही है खून से सींचे हुये अभिमान की माटी
जहां हँस कर लुटाते जाँ यही बलिदान की माटी
जो माँ पर आँच ना आने दें ऐसे शेर से बेटे
जना करती है अपने देश हिंदुस्तान की माटी

माँ तेरी कृपा से हम आकाश झुका देंगे
ग़र पड़ी ज़रूरत तो खुद को भी मिटा देंगे
एक माँ तू एक माँ है अपनी भारत माता
यहाँ दीप जला देंगे वहाँ, शीश कटा देंगे

कर दें जो मन मधुर घण्टियाँ पूजिये
शक्तिरूपी कनक रश्मियाँ पूजिये
माँ को खुश करने का है तरीका सरल
भगवती रूप में बेटियां पूजिये

शान को अपनी परिंदों की शान तक रखना
हसरतें आप भी ऊँची उड़ान तक रखना
ठोस आधार का होना मगर ज़रूरी है
ज़मीं पे पाँव ख़्वाब आसमान तक रखना

शांति सद्भाव का रंग धो जायेगा
होगा अन्याय तब न्याय खो जायेगा
शक्ति का यदि अहं से हुआ मेल तो
एक रावण वहीं पैदा हो जायेगा

Monday, 11 December 2017

मन तुझको

मन तुझको मैं क्या बहलाऊँ टूटी फूटी आशाओं से

मुझे पता है टूट चुका है जो था अब तक भ्रम का घेरा
किरणें झूठी लुप्त हुई हैं अब यथार्थ का  घोर  अँधेरा

यंत्र तंत्र कब बाँध सकें हैं अजय काल को सीमाओं से

एक नियंता एक धुरी है शेष जगत तो  चाकर  ठहरा
सबका है अस्तित्व उसी से ऊँचा नभ या सागर गहरा

करूँ अहं क्या सुविधाओं का क्या घबराऊँ विपदाओं से

पल भर को भूला था तुझको सोचा था मैं बहुत बड़ा हूँ
जीवन के अंतिम क्षण पाया जहां से चला वहीं खड़ा हूँ

लक्ष्य डूबना  था  मेरा  मैं  क्यों  लड़ता  था धाराओं से

जीवन पथ पर विजय मिली तो श्रेय लिया मोती बाँटे
अश्रु असीमित बहे वहाँ पर  जहाँ  मिले  थोड़े  काँटे

क्यों न रहा मैं परे जीत की और हार की घटनाओं से

लिखे हुये में जुड़े घटे ना चाहे जितनी  कलम  चला ले
लिखने और मिटा सकने का जानें क्यों झूँठा भ्रम पाले

सत्य तुझे मैं क्यों झुठलाऊँ उम्मीदों की कविताओं से
                                          प्रवीण 'प्रसून'
             

Tuesday, 5 December 2017

आँसू

रात  तन्हा   है  मेरी  और   सहारे  आँसू
ख़त्म  उम्मीद  नहीं  और  न  हारे  आँसू

दर्द की शब में सबब पूछ उजाले का क्या
चंद  उम्मीद   लिये   चाँद  सितारे  आँसू

सूख कर गाल में एक नक्श बना डाला है
हू-ब -हू  दिल  की  दास्तान  उभारे  आँसू

संग  शहनाइयों  के   चूर   ख़्वाब  हो  बैठे
टूट कर गिर गये  आंखों  से  कुँआरे  आँसू

सूख कर रह  गयीं  आँखें  इधर  जुदाई  में
शख़्स यक ले गया है साथ  में  सारे  आँसू
                       
                             प्रवीण 'प्रसून'

Sunday, 19 November 2017

मुक्तक

इधर से हाथ जोड़े जा रहे  हैं
उधर से सांप छोड़े जा रहे  हैं
चुनावी दौर दारू मुफ़्त की है
शहर में काँच तोड़े जा रहे  हैं
                            -प्रवीण 'प्रसून'