Thursday, 5 January 2017

221 2121 2121 212
थोड़ा सा मैं बबूल हूँ तो फूल भी तो हूँ
मक़बूल भी तो हूँ

Sunday, 1 January 2017

बदलते रहे

वो क्यों बोलने में सँभलते रहे
लगा मुझको सच वो निगलते रहे
वहाँ ख़ास की पूछ होती रही
मियां आम थे हम तो टलते रहे
मिरी ज़िन्दगी की कहानी छपी
रिसाले हज़ारों निकलते रहे
छपा था जो अन्दर वही रह गया
कवर पेज लेकिन बदलते रहे
पता था मुझे झूठ बोला गया
ये मज़बूरियां थी बहलते रहे
    :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Thursday, 29 December 2016

क्यूँ नहीं लेते

221 2121 1221 122
रिश्तों में रंग फिर से चढ़ा क्यूँ नहीं लेते
गिरते हुए मकाँ को बचा क्यूँ नहीं लेते
वो हँस रहे हैं देख तुम्हें अश्क़ बहाते
ये दर्द दुश्मनों से छुपा क्यूँ नहीं लेते
बाहर जो बात जायेगी तो और बढ़ेगी
आँगन में ही ये बात बना क्यूँ नहीं लेते
मौका है दूरियाँ मिटा के प्यार जगाओ
रूठे जो उनसे हाथ मिला क्यूँ नहीं लेते
भूखा पड़ा जो उसको खिला करके निवाला
है बेशकीमती जो दुआ क्यूँ नहीं लेते
      :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
       फतेहपुर उ.प्र.

Tuesday, 27 December 2016

जो दिया था दिल उन्हें गाता हुआ

2122 2122 212
जो दिया था दिल उन्हें गाता हुआ
मिल गया वापस मुझे टूटा हुआ
चोरियां उस रात कुछ ज़्यादा हुईं
देर तक जिस रात को पहरा हुआ
इश्क की उलझन न सुलझी यक दफा
हर दफा मैं ही मिला उलझा हुआ
अश्क़ ने अपना तआरुफ़ यूँ दिया
मैं समन्दर,  बूँद में सिमटा हुआ
अब किसी सूरत न होगा वो जुदा
है यूँ मेरी रूह से लिपटा हुआ
   :प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
         फतेहपुर उत्तर प्रदेश

Monday, 26 December 2016

बरकत करते हैं

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लेकर नेक खयाल अगर हम मेहनत करते हैं
बेशक़ अपनी शोहरत में हम बरकत करते हैं
मंचों पर संजीदा हो कुछ शिरकत करते हैं
कुछ ऐसे भी हैं जो ओछी हरकत करते हैं।
लोग उन्हें कितना नादान समझने लगते हैं
जो हाथों को जोड़ किसी की इज़्ज़त करते हैं।
नाम बुलंदी पर लिख पाना तब ही तो मुमकिन
जब पर्वत पर चढ़ने की हम हिम्मत करते हैं।
अपनी खुशियां दे औरों का ग़म जो ले लेते
लोग फ़रिश्ते बन धरती को ज़न्नत करते हैं।

Sunday, 18 December 2016

गीत:मेरी चिता के ऊपर

मेरी चिता के ऊपर पहचान तब बनाना,
जगतारिणी नदी में तब अस्थियां बहाना।
लाखों गये डगर से,
पर मुश्किलें वहीं हैं
बच बच निकल गए सब
काँटे अभी वही हैं।
जो कुछ को चुन सकूँ मैं, दो फूल तब चढ़ाना।
कुछ रात में अभी तक
कुछ का हुआ सवेरा
आँगन में रौशनी है
कोने में है अँधेरा
इस तम को हर सकूँ यदि, दीपक तभी जलाना ।
है देख कर दुःखित मन
पौधे ये सूखे सूखे
कितने सड़क किनारे
हैं नवनिहाल भूखे
कुछ की क्षुधा मिटाऊँ तब भोज तुम कराना
जिसके लिए ये जीवन
संघर्ष ही रहा है
आघात अभावों के
जो मुस्कुरा सहा है
उसकी जो जीत लिख दूँ तब हार तुम चढ़ाना।

Saturday, 17 December 2016

सँभाला होगा


किस तरह तुमने भला दिल को सँभाला होगा।
जब मुझे अपने खयालों से निकाला होगा।
दूर वो मुझसे रहे खुश हो ये मुमकिन ही नहीं,
दर्द को मान लो मुस्कान में ढाला होगा।
हुक़्म है एक सितारे को फ़ना होने का,
अब तो सूरज का तेरे घर में उजाला होगा।
मैं इसी ख़्याल में डूबा हूँ हुआ क्या है जो,
बीच बाज़ार मुहब्बत को उछाला होगा
रौंद इस दिल को अगर तुमने बढ़ाये हैं कदम
रास्ता फिर वो यकीनन कोई आला होगा।
  प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'
    फतेहपुर उ.प्र.