Monday, 2 November 2015

ग़ज़ल

यहाँ हर शख़्स बस अपने लिए पागल दिखाई दे।
शहर अपना मुझे जैसे कोई' जंगल दिखाई दे।
कहाँ किस मोड़ पे ठहरी हुई है ज़िन्दगी आकर
हजारों प्रश्न हैं लेकिन न कोई हल दिखाई दे।
खिला है ग़ुल हिले पत्ते चले जब रेशमी झोंके
जुनूँ मेरा कहीं चेहरा कहीं आँचल दिखाई दे।
उसूलों को किया नीलाम तब नेता बना है वो
कभी इस दल दिखाई दे कभी उस दल दिखाई दे।
नकल से पास थे जो लग्ज़री गाड़ी चलाते हैं
पढाई में रहा अव्वल मुझे पैदल दिखाई दे।
-प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

प्रशस्ति पत्र

Sunday, 1 November 2015

मेरी ग़ज़लें

1.
तरक़्क़ी का मुझे ये रास्ता तैयार लगता है।
सियासत फ़ायदे वाला मुझे व्यापार लगता है।
धरम के नाम पर बेख़ौफ़ क़त्ले आम जारी है,
नफ़रत का यक़ीनन गर्म अब बाज़ार लगता है। 
नज़र में छा गया वो शख़्स कुछ ऐसा कि मत पूँछो,
उसके सामने हर अक़्स अब बेकार लगता है।
जुनूँ मेरा है उसके वास्ते ये क्या बताऊँ मैं,
पहली बार जैसा वो मुझे हर बार लगता है।
मुझे अच्छे नहीं लगते सितारे आसमा के अब,
ज़ेहन अच्छा नहीं होता तो गुल भी ख़ार लगता है
2.
मुहब्बत में यकीनन वक़्त तो बेकार होता है।
मगर इक खूबसूरत सिलसिला तैयार होता है।
न समझो आग तूफानों में ठंडी हो गई बुझकर
इश्क़ की राख में भी तो छुपा अंगार होता है।
चमक आँखों में आ जाती है जाने क्यूँ न जानूँ मैं
जब भी कभी उस शख्स का दीदार होता है।
मुहब्बत को निभा लेना नहीं आसान है यारों
गुलिस्ताँ की सुरक्षा में कँटीला तार होता है
संभालो इस अमानत को बहुत ही कीमती है ये
ज़िन्दगी के सफ़र में इश्क़ बस इक बार होता है।

3.
किसी के ग़म तले आँसू बहाना भूल जाता हूँ।
बड़ा खुदगर्ज़ हूँ' गुज़रा ज़माना भूल जाता हूँ।
न रखना दिल में' तू मेरी वफ़ा पर शक़ नहीं करना
भुलक्कड़ हूँ ज़रा वादा निभाना भूल जाता हूँ
चमक में भूल कर ख़ुद को उलझ जग के भुलावे में
सफ़र में हूँ, किधर अपना ठिकाना भूल जाता हूँ
दिखाई रौशनी जिसने अँधेरे दौर में मुझको
उसी के सामने दीपक जलाना भूल जाता हूँ
ज़ुदा मुझको न करना भूलकर मेरी ये' आदत है
चला जाऊँ अगर तो लौट आना भूल जाता हूँ।

4.
 फ़िज़ा के रंग से वो शख़्स तो अन्जान लगता है।
भले ज़िन्दा मगर मुझको बहुत बेज़ान लगता है।
बहुत पैसा बहुत रुतबा बहुत असबाब रखता है
न रोना बंद फिर भी,  ग़म भरी दूकान लगता है।
ज़माने ने खरी-खोटी उसे जीभर सुनाई है
अभी भी कह रहा है इश्क़ तो आसान लगता है।
सफेदी है फ़क़त तन में, मगर मन स्याह ही इनका
ख़ुदा जिसको समझते हो मुझे शैतान लगता है।
शहर के फ्लैट में सब है मगर मन ऊब जाता है
बहुत अच्छा मुझे वो गाँव का दालान लगता है।

5.
 कभी गुज़रे हुए दुःख दर्द को तुम याद मत करना।
ख़ुशी के वक़्त को भी बेवज़ह बर्बाद मत करना।
मुसलमां और हिन्दू को लड़ाने की वज़ह हैं ये
मियां ये नागफनियाँ हैं इन्हें आबाद मत करना।
बड़े मीठे बड़े खट्टे मिलन के पल सनम देखो
विरह का ज़िक्र करके तुम इन्हें बेस्वाद मत करना।
सुकूँ मुझको बहुत है प्यार की इस क़ैद में जानम
मुझे दिल के झरोखे से कभी आज़ाद मत करना।
बुढ़ापे के लिए बस एक ही उम्मीद होती है
किसी को ऐ ख़ुदाई पाक बेऔलाद मत करना

 6.
अगर हमको तुमसे मुहब्बत न होती
कभी तुमसे कोई शिकायत न होती
कहानी न बढ़ती हमारी तुम्हारी
अगर आँख से वो शरारत न होती
अगर ख़ून में दूध माँ का न होता
हमारे वतन की हिफाज़त न होती
शहर में यक़ीनन बड़ा नाम होता
अगर मुझमें इतनी शराफ़त न होती
ये मुश्किल भरे दिन न कटते हमारे
अगर दोस्ती की अमानत न होती
गुलिस्ताँ हमारा महकता ही रहता
अगर इतनी गंदी सियासत न होती
अगर प्यार बेटों के दरम्यान होता
चिता में पिता की ज़लालत न होती

                                            copyright@    -प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून


Saturday, 19 October 2013

ग़ज़ल

महलों का करेंगे क्या हमें कोने की आदत है।
हमें सोना नहीं देना हमें सोने की आदत है।
बड़ी मुश्किल से ढूँढा था,मगर फिर लापता है वो
उसे क्या खोजना है जी,जिसे खोने की आदत है।
सताता है ये खालीपन,सालती है ये बेफ़िक्री,
ये कंधे लग रहे हल्के, हमें ढोने की आदत है।
 खज़ाना पाके क्या वो लोग हँसना सीख जायेंगे,
जिन्हें औरों के आगे बेवज़ह रोने की आदत है।
             -कॉपीराइट @प्रवीण कुमार श्रीवास्तव ,फतेहपुर

Tuesday, 13 August 2013

पोपली आजी

पोपली आजी
मरकर भूत बन गई है
सब मोहल्ले वाले कहते हैं
और ये भी .....
कि वो डराती है
रात-बिरात
काश ...... वो मेरे पास भी
आये .....डराये
मोहल्ले के सारे बच्चों को
दुलराती थी पोपली आजी
अपने घर के बाहर बैठी
और मुझे सब से ज़्यादा
या ........
हर एक बच्चे को यही महसूस होता
जब से वो मरी है
हमारा टोला गुमसुम है
........और टोली भी
 मैं सोचता हूँ
भूत बनकर भी
कैसे वो डरा पायेगी किसी को
बोलती थी तो
फूक ही निकल जाता था
पोपली आजी के मुँह से
कहानियाँ सुनाती ....हँसाती  आजी
कैसी लगती होगी डराती हुई
मैं सोचता हूँ अगर
वो मुझे डराने आये
तो उसको देखकर ही
हँसते-हँसते मेरा दम निकल जाये

Thursday, 25 July 2013

एक कविता तुम्हारे नाम


तुम्हे पता नहीँ कि,मैँ तुम्हे कितना लाइक करता हूँ
मेरे लैपी के वालपेपर पर रहती हो तुम ही,
स्माइल करती हुयी।
मेरे फ्रेन्ड अक्सर ही शरारत में चुरा लेते हैँ 
पासवर्ड मेरी ईमेल आई डी का
क्यूँकि वो होता है
तुम्हारे ही नाम के अल्फाबेट्स पर हमेशा
कई बार तुम्हेँ ऑनलाइन पाकर मचल उठता हूँ कि
कह दूँ दिल की बात
पर...चैट बाक्स खोलकर रह जाता हूँ बस
लेकिन सच बताना
क्या तुम तब भी समझ नहीँ पाती हो
कि मैँ तुम्हे कितना ल.....सॉरी लाइक करता हूँ
जब मैँ फेसबुक पर तुम्हारे हर पोस्ट को लाइक करता हूँ
और फिर भी मन नहीँ भरता
तो कमेन्ट बाक्स मेँ भी लिख देता हूँ लाइक लाइक लाइक

(कॉपीराइट@रचनाकार प्रवीण कुमार श्रीवास्तव)

Wednesday, 1 May 2013

आऊँगी ना लौट दुबारा

(हैवानों का शिकार हुई मासूम बहनों की ओर से)


डूब गया इक नन्हा तारा।
हैवानों से जीवन हारा।।
मुश्किल से आँखें खोली थी,
अंतिम बारी फिर रो ली थी,
ज़्यादा कुछ वह कह न पायी,
छुटकी बस इतना बोली थी,
पापा मेरी क्या ग़लती थी,
अंकल ने क्यूँ मुझको मारा?
मेरे जाने पर मत रोना,
होंठो की मुस्कान न खोना,
मुझको बस चिंता इतनी ही,
मेरे भैया मेरे सोना,
दूज और रक्षाबंधन को,
कौन करेगा तिलक तुम्हारा।
मम्मी मेरे बिन रह लेना,
मैं जाती हूँ दुःख सह लेना,
कहना-सुनना जो बाकी हो,
सपनों में अब कह-सुन लेना,
दुनिया मम्मा गन्दी कितनी,
आऊँगी ना लौट  दुबारा।
               रचनाकार-प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
                               फतेहपुर उ.प्र.
कॉपीराइट @प्रवीण कुमार श्रीवास्तव