Wednesday, 1 May 2013

आऊँगी ना लौट दुबारा

(हैवानों का शिकार हुई मासूम बहनों की ओर से)


डूब गया इक नन्हा तारा।
हैवानों से जीवन हारा।।
मुश्किल से आँखें खोली थी,
अंतिम बारी फिर रो ली थी,
ज़्यादा कुछ वह कह न पायी,
छुटकी बस इतना बोली थी,
पापा मेरी क्या ग़लती थी,
अंकल ने क्यूँ मुझको मारा?
मेरे जाने पर मत रोना,
होंठो की मुस्कान न खोना,
मुझको बस चिंता इतनी ही,
मेरे भैया मेरे सोना,
दूज और रक्षाबंधन को,
कौन करेगा तिलक तुम्हारा।
मम्मी मेरे बिन रह लेना,
मैं जाती हूँ दुःख सह लेना,
कहना-सुनना जो बाकी हो,
सपनों में अब कह-सुन लेना,
दुनिया मम्मा गन्दी कितनी,
आऊँगी ना लौट  दुबारा।
               रचनाकार-प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
                               फतेहपुर उ.प्र.
कॉपीराइट @प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

Tuesday, 30 April 2013

राक्षस


स्वीटी को नींद नहीं आ रही थी।वह मेरे बगल में लेटी पता नहीं क्यूँ उदास सी छत को निहार रही थी।
"सो जाओ स्वीटी कल स्कूल नहीं जाना है क्या?सेवेंथ में पहुँच गई हो अब बंक  नहीं चलेगा,डेली स्कूल जाना है।चलो आँखें बंद करो और सो जाओ।"
"नींद नहीं आ रही है मम्मी" स्वीटी मेरी ओर  करवट बदलते हुए बोली।
"अच्छा  बेटा कहानी सुनोगी "
स्वीटी चहक उठी "हाँ मम्मी सुनाओ ना।"
"ठीक है मैं कहानी सुना रही हूँ तुम सुनते-सुनते सो जाना ठीक है।" 
"ओ.के . मम्मी"स्वीटी ने सर  हिलाया.
"मेरा प्यारा बेटा" मैंने स्वीटी के माथे को  चूम लिया, और कहानी सुनाने लगी-"एक था राजा।उसकी एक प्यारी सी बेटी थी।जिसका नाम था राजकुमारी प्रियंवदा।वह बहुत सुन्दर और प्यारी थी।बिलकुल तुम्हारे जैसी ......" मैं रुकी तो स्वीटी बोल उठी "मम्मी आगे सुनाओ ना! "
"हाँ हाँ सुनाती हूँ",मैंने कहानी आगे बढाई एक दिन दोपहर में खेलते-खेलते वह बाग  में पहुँच गई। वहाँ एक राक्षस रहता था।
स्वीटी बीच में ही बोल पड़ी-"फिर क्या हुआ मम्मी क्या राक्षस ने राजकुमारी प्रियंवदा के साथ रेप किया ...और वह मर गई!मम्मी ये रेप क्या .....? मैं जोर से चिल्लाई "ये सब तुम्हे किसने बताया?"
"वो मम्मी टी.वी . पर ........" स्वीटी चुप हो गई।
"चुपचाप कहानी सुनो",मैंने आगे सुनाना शुरू किया-राजकुमारी बाग़ में एक  आम के पेड़ के नीचे पहुंची उसने पेड़ पर देखा तो…"स्वीटी सुन रही हो ना! मैंने  कहानी रोक कर पूछा।स्वीटी तो सो चुकी थी,लेकिन मैं ......रात भर छत निहारती रही।              copyright@प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

Saturday, 23 March 2013

गौरैया:हाइकू में

सूना आँगन
उड़ चुकी गौरैया
हमसे दूर

डाल  से डाल
गौरैया ना फुदकी
बड़े दिनों से

गौरैया पगी
चहचहाई जब
छुटकी जगी

क्या है गौरैया?
करेगा बचपन
गूगल सर्च

Thursday, 7 February 2013

तुम ..


तुम हौले से मुस्काई ...
जैसे कोई ख्वाहिश
रह गई कसमसाकर
पूरी होने को
तुम हँसी
जैसे घने कोहरे के बीच
अचानक हँस पड़ी धूप
तुम ने कुछ लफ्ज़ हवा में तैराए
सफ़ेद चादर पर छितर गए
सात रंग चटकीले
तुम उँगलियों से
चेहरे पर आयी लट हटाती रही
मेरे मन में अनगिन प्रश्न
उलझते-सुलझते रहे
तुम्हारी नज़रें मेरी नज़रों से मिलीं
मेरा तन बदन होता गया गुलाबी
तुमने कदम बढ़ाये
खिलते गए गुलाब
तुम्हारे क़दमों के आगे
और पीछे ....
महकती रही मिट्टी देर तलक
-प्रवीण कुमार श्रीवास्तव


Friday, 4 January 2013

2-हाइकू

रोता रहा मैं
ट्वीट कर वो चला
बहुत खला

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ग़म में हम
फेसबुकिया सारे
लाइक मारें

Friday, 7 December 2012

पाँच हाइकू सम्माननीय किसान बंधुओं के लिए-


और की भूख
परिणाम सम्मुख
भूमि बंजर

भूमि है माता
भर देगी उदर
प्यार तो कर

पाले उदर
दवा के नाम पर
दे ना ज़हर

चला फावड़ा
कृषिभूमि में सच
स्वर्ण है गड़ा

पसीना बहा
खेत का है संदेश
आँसू ना बहा


Tuesday, 4 December 2012

हाइकू दिवस पर

साहित्याकाश
प्यारे हाइकु तारे
चमकें सदा

काव्य नभ के
झिलमिल सितारे
हुए हाइकु

गीत सूरज
ग़ज़ल आफ़ताब
हाइकू तारे