Monday, 8 October 2018

मुक्तक

यही है खून से सींचे हुये अभिमान की माटी
जहां हँस कर लुटाते जाँ यही बलिदान की माटी
जो माँ पर आँच ना आने दें ऐसे शेर से बेटे
जना करती है अपने देश हिंदुस्तान की माटी

माँ तेरी कृपा से हम आकाश झुका देंगे
ग़र पड़ी ज़रूरत तो खुद को भी मिटा देंगे
एक माँ तू एक माँ है अपनी भारत माता
यहाँ दीप जला देंगे वहाँ, शीश कटा देंगे

कर दें जो मन मधुर घण्टियाँ पूजिये
शक्तिरूपी कनक रश्मियाँ पूजिये
माँ को खुश करने का है तरीका सरल
भगवती रूप में बेटियां पूजिये

Monday, 11 December 2017

मन तुझको

मन तुझको मैं क्या बहलाऊँ टूटी फूटी आशाओं से

मुझे पता है टूट चुका है जो था अब तक भ्रम का घेरा
किरणें झूठी लुप्त हुई हैं अब यथार्थ का  घोर  अँधेरा

यंत्र तंत्र कब बाँध सकें हैं अजय काल को सीमाओं से

एक नियंता एक धुरी है शेष जगत तो  चाकर  ठहरा
सबका है अस्तित्व उसी से ऊँचा नभ या सागर गहरा

करूँ अहं क्या सुविधाओं का क्या घबराऊँ विपदाओं से

पल भर को भूला था तुझको सोचा था मैं बहुत बड़ा हूँ
जीवन के अंतिम क्षण पाया जहां से चला वहीं खड़ा हूँ

लक्ष्य डूबना  था  मेरा  मैं  क्यों  लड़ता  था धाराओं से

जीवन पथ पर विजय मिली तो श्रेय लिया मोती बाँटे
अश्रु असीमित बहे वहाँ पर  जहाँ  मिले  थोड़े  काँटे

क्यों न रहा मैं परे जीत की और हार की घटनाओं से

लिखे हुये में जुड़े घटे ना चाहे जितनी  कलम  चला ले
लिखने और मिटा सकने का जानें क्यों झूँठा भ्रम पाले

सत्य तुझे मैं क्यों झुठलाऊँ उम्मीदों की कविताओं से
                                          प्रवीण 'प्रसून'
             

Tuesday, 5 December 2017

आँसू

रात  तन्हा   है  मेरी  और   सहारे  आँसू
ख़त्म  उम्मीद  नहीं  और  न  हारे  आँसू

दर्द की शब में सबब पूछ उजाले का क्या
चंद  उम्मीद   लिये   चाँद  सितारे  आँसू

सूख कर गाल में एक नक्श बना डाला है
हू-ब -हू  दिल  की  दास्तान  उभारे  आँसू

संग  शहनाइयों  के   चूर   ख़्वाब  हो  बैठे
टूट कर गिर गये  आंखों  से  कुँआरे  आँसू

सूख कर रह  गयीं  आँखें  इधर  जुदाई  में
शख़्स यक ले गया है साथ  में  सारे  आँसू
                       
                             प्रवीण 'प्रसून'

Sunday, 19 November 2017

मुक्तक

इधर से हाथ जोड़े जा रहे  हैं
उधर से सांप छोड़े जा रहे  हैं
चुनावी दौर दारू मुफ़्त की है
शहर में काँच तोड़े जा रहे  हैं
                            -प्रवीण 'प्रसून'
  

Sunday, 29 October 2017

सरदार पटेल

  अदम्य शक्ति देशभक्ति सौम्यता  का  मेल था
  जो राष्ट्र के लिये जिया वो नाम एक पटेल था

सरल स्वभाव था मगर वो व्यक्ति अति विशेष था
वो कार्य पूर्ण कर दिया  जो   कार्य  एक  शेष  था
जो  चित्र  था  अपूर्ण  पूर्ण  मानचित्र   कर  दिया
किया अखण्ड सिंह ने जो खण्ड -खण्ड  देश  था

अथाह शक्ति पुंज  था  वो  भारती  का  लाल  था
समस्त विश्व  के  लिये  अतुल्य  एक  मिसाल  था
बँटे   कटे   मनों   को   एकता   के  सूत्र  में  पिरो
जो काम उसने कर दिया वो काम क्या कमाल था

वो   कर्म   में   कठोर   था  इसीलिए  अजेय  था
सृजन   में   राष्ट्र   के   बहुत  महत्वपूर्ण श्रेय  था
कभी  न   लोभ   में   बँधा  अनन्य  देशभक्त  वो
एकमेव   सेवा   मातु   भारती   की    ध्येय   था

बही  न  बूँद  रक्त  की  विजय  हुई  जिधर  चला
वो विश्व को सिखा गया है क्रांति की  नयी  कला
महापुरुष  महाबली  वो  लौह  -सा  अडिग  रहा
जो कर लिया विचार फिर विचार  से  नहीं  टला
                             :प्रवीण 'प्रसून'

Monday, 25 September 2017

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के प्रति

भारतीयता के संपोषक, भारत माँ के लाल
अंत्योदय के सच्चे चिंतक, पंडित दीनदयाल

सजग प्रहरी थे देश के...

समतामूलक राजनीति का
करते रहे प्रसार
राष्ट्रभक्ति जनसेवा ही हो
राजनीति आधार

वैभव परम् राष्ट्र ये पाये, चमके माँ का भाल
अंत्योदय के सच्चे चिंतक, पंडित दीनदयाल

सजग प्रहरी थे देश के....

एक सूत्र में तुलसी मोती , दोनों रहे पिरोते
राष्ट्र जागरण पुष्ट संगठन , लक्ष्य जागते सोते

पीड़ित शोषित दलित जनों के,बने रहे जो ढाल
अंत्योदय के सच्चे चिंतक, पंडित दीनदयाल

सजग प्रहरी थे देश के....

सौम्य और साधारण जीवन
जीने को कहते थे
वैसे ही रहने को कहते
ख़ुद जैसा रहते थे

कथनी करनी एक अगर हो, जीवन बने मिशाल
अंत्योदय के सच्चे चिंतक, पंडित दीनदयाल

सजग प्रहरी थे देश के....
                          
                  : प्रवीण श्रीवास्तव 'प्रसून'

Tuesday, 22 August 2017

आज़माते रहे हैं

इधर मुझको अपना बताते रहे हैं
उधर उम्र भर आज़माते रहे हैं

किसे ख़्वाब ये मखमली से लगे हैं
हमें ख़्वाब अब तक डराते रहे हैं

जिन्हें दोस्तों का दिया नाम हमने
वो ताज़िन्दगी काम आते रहे हैं

सुकूँ पा रही हैं जिन्हें देख नज़रें
वही मेरे दिल को सताते रहे हैं

अदावत निभाते रहे चुपके चुपके
मगर दावतों में बुलाते रहे हैं